सोलर पानी के शुद्धीकरण का स्कूल परियोजना: एक मॉडल बनाना है या एक वास्तविक स्थापना लगाना है?
लेखक: यश जाधव
Solar water purifier for school बारे में गूगल पर लिखने वाले लोग एक जैसे नहीं होते। कोई छात्र हो सकता है जिसकी अगले हफ्ते साइंस प्रदर्शनी है और घर पर बनने वाला कोई मॉडल चाहिए। कोई प्रिंसिपल या सरपंच हो सकता है जो सोच रहा है कि स्कूल के बच्चे कब तक बोरवेल का खारा पानी पीएंगे।
दोनों की आवश्यकता अलग-अलग होती है, इसलिए हम इसे दो हिस्सों में बांटते हैं। पहले मॉडल, फिर वास्तविक प्लांट। जो आपके काम का हो, उसी से शुरू करें।
बच्चों के लिए मॉडल: सोलर स्टिल
पहले इसके काम करने के तरीके को समझ लें। धूप में रखी एक काली थाली में खारा पानी है। धूप की गर्मी से पानी भाप में बदल जाता है। भाप ऊपर लगे ठंडे शीशे से टकराती है और बूंद बन जाती है। बूंदें ढलान से नीचे फिसलकर अलग कटोरे में गिरती हैं। नमक और गंदगी नीचे रह जाते हैं क्योंकि वे भाप के साथ ऊपर नहीं जाते। बस, यही सोलर स्टिल है।
घर में ही इसकी चीजें मिल जाएंगी। एक चौड़ा उथला टब, काला पेंट, एक छोटा कटोरा, और ऊपर ढकने के लिए साफ कांच या मोटी पारदर्शी प्लास्टिक।
टब के अंदर काला रंग चढ़ाएं, क्योंकि काली सतह धूप की गर्मी अधिक सोखती है। उसमें थोड़ा खारा पानी डालें, चाहे तो चुटकी भर नमक भी घोल लें। बीच में एक कटोरा रखें, इतना ऊंचा कि टब का पानी उसमें न चढ़े। अब ऊपर कांच लगाएं, लेकिन सीधा नहीं, थोड़ा झुका हुआ। कांच का सबसे नीचा किनारा कटोरे के ठीक ऊपर होना चाहिए। पूरा व्यवस्था इसी झुकाव पर निर्भर करती है। किनारों को टेप या सिलिकॉन से बंद कर दें, नहीं तो भाप बाहर निकल जाएगी और सारी मेहनत बर्बाद हो जाएगी।
अब इसे दिनभर तेज धूप में छोड़ दें। शाम तक कटोरे में 100-200 मिलीलीटर पानी मिल सकता है। यह ज्यादा नहीं है, मैं यह मानता हूं। लेकिन जब आप टीडीएस मीटर से पहले और बाद के पानी की रीडिंग दिखाते हैं, तब इसका मजा आता है। जज को पानी की मात्रा याद नहीं रहती, लेकिन आपका नंबर याद रहता है। इसके साथ एक छोटा चार्ट भी बना लें कि उस दिन तापमान कितना रहा। इससे आपका मॉडल खिलौना नहीं, बल्कि एक प्रयोग लगेगा।
अगर पानी बहुत कम बन रहा है तो दो बातें जांचें। पहला, कांच पर जमी बूंदें कटोरे में गिरने के बजाय वापस टब में टपक रही हैं? ढलान बढ़ा दें। दूसरा, किनारों से भाप निकल रही है? एक बार फिर टेप जांच लें। और मॉडल को ऐसी जगह रखें जहां दोपहर में छाया न पड़े। एग्जीबिशन से पहले दो बार टेस्ट कर लेंगे तो उस दिन घबराहट नहीं होगी।
तो क्या यही मॉडल स्कूल में लगा दें?
नहीं, और यहीं लोग गलती करते हैं। एक वर्ग मीटर के सोलर स्टिल से पूरे दिन में केवल कुछ लीटर पानी ही मिलता है। दो सौ बच्चों के स्कूल को रोजाना चार-छह सौ लीटर पीने का पानी चाहिए। इसके लिए पूरी छत लगानी पड़ेगी। इसलिए स्कूलों में आमतौर पर सोलर पैनल से चलने वाला आरओ प्लांट लगाया जाता है, जिसमें पंप धूप की बिजली से चलता है।
वास्तविक प्लांट की क्षमता कितनी होनी चाहिए?
पहला कदम मशीन नहीं, पानी की जांच है। अगर टीडीएस 500 से कम है तो साधारण फिल्टर चल सकता है, लेकिन 1000 से ऊपर हो तो आरओ जरूरी होता है। कुछ क्षेत्रों में फ्लोराइड या आर्सेनिक की समस्या होती है, जो टीडीएस मीटर से देखा नहीं जा सकता। इसलिए एक बार लैब रिपोर्ट जरूर ले लें।
फिर हिसाब सीधा है। एक बच्चे को पीने और हाथ-मुंह धोने के लिए रोज़ 3 से 5 लीटर पानी चाहिए। सौ बच्चों के स्कूल में 100-150 लीटर प्रति घंटे वाला प्लांट काफी होता है, क्योंकि वह कई घंटे चलता है। अगर तीन सौ से ज्यादा बच्चे हों तो 250 से 500 एलपीएच तक देखें।
खर्च कितना होगा?
ये मोटे अंदाजे हैं, क्योंकि दाम कंपनी, शहर और पैनल की क्षमता पर निर्भर करते हैं। 100 एलपीएच का छोटा प्लांट पैनल और इंस्टॉलेशन मिलाकर आमतौर पर लगभग 60 हजार से 1.5 लाख रुपये के बीच आता है। 250 एलपीएच का 1.5 से 3 लाख रुपये तक, और 500 एलपीएच या उससे अधिक का प्लांट 3 लाख से ऊपर होता है, जिसमें टैंक और पाइपलाइन अलग से जुड़ती है। फैसला लेने से पहले दो-तीन कंपनियों से लिखित कोटेशन जरूर लें।
असली खर्च बाद में आता है। आरओ मेम्ब्रेन और फिल्टर कुछ सालों में बदलने पड़ते हैं, और अक्सर ऐसा होता है कि प्लांट पहले साल चलता है और फिर बस इसलिए बंद हो जाता है कि फिल्टर बदलवाने का पैसा किसी के पास नहीं होता। इसलिए खरीदने से पहले तय कर लें कि सालाना मेंटेनेंस का पैसा कहां से आएगा।
एक आसान तरीका है कि स्कूल के कोई एक शिक्षक और दो-तीन बड़े बच्चे प्लांट के “जिम्मेदार” बना दिए जाएं। वे हफ्ते में एक बार टीडीएस नापें और रजिस्टर में लिख दें। इससे बच्चों को विज्ञान भी समझ आता है, और प्लांट बिगड़ने से पहले ही पकड़ में आ जाता है।
पैसा कहां से आएगा?
सरकारी स्कूलों में आमतौर पर पंचायत फंड या जिला स्तर की पानी से जुड़ी योजनाएं काम आती हैं। निजी स्कूल और ट्रस्ट अपने खर्च से या किसी कंपनी की सीएसआर मदद से ये करवाते हैं। योजनाएं राज्य और समय के हिसाब से बदलती रहती हैं, इसलिए जिला परिषद या शिक्षा कार्यालय में एक बार खुद पूछ लें।
इंस्टॉलर चुनते समय क्या देखें?
सबसे पहले, ये देखें कि बिक्री के बाद की सर्विस कितनी पास से मिलेगी। गांव के स्कूल में वह प्लांट बेकार है जिसकी मरम्मत के लिए तीन दिन इंतजार करना पड़े। पैनल, पंप और मेम्ब्रेन की वारंटी अलग-अलग पूछें। और अगर कोई किसी के पानी की जांच किए बिना सीधे प्लांट बेचने लगे, तो समझ जाएं कि संभलकर चलना है।
अंत में
अगर आप छात्र हैं तो सोलर स्टिल बनाएं और अपने आंकड़े खुद नापें। अगर आप स्कूल से जुड़े हैं तो पहले पानी की जांच करवाएं, फिर क्षमता तय करें। साफ पानी की शुरुआत किसी बड़ी मशीन से नहीं, बल्कि एक छोटी जांच से होती है।
*यश जाधव सोलर और पानी से जुड़े विषयों पर सीधी, साफ और आसान भाषा में जानकारी लिखते हैं।
यश जाधव सूर्य ऊर्जा गाइड के संस्थापक और कंटेंट राइटर हैं। उनका फोकस भारत में सोलर ऊर्जा से जुड़े विषयों पर है, जैसे पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना, राज्यवार सोलर सब्सिडी, रूफटॉप सोलर की लागत और पीएम कुसुम सोलर पंप योजना। वे सरकारी पोर्टल और आधिकारिक अधिसूचनाओं से जानकारी जाँचकर ऐसी गाइड लिखते हैं जो घर और किसान दोनों के काम आएँ।