solar panel efficiency kam kyun hoti hai: आपकी छत पर असल में क्या हो रहा है

लेखक: यश जाधव

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solar panel efficiency kam kyun hoti hai गर्मी की एक दोपहर आप इन्वर्टर की स्क्रीन देखते हैं और माथे पर बल पड़ जाते हैं। इंस्टॉलर ने कहा था कि 3 kW का सिस्टम है, तो कम से कम 3 kW बिजली तो बननी चाहिए। लेकिन स्क्रीन पर 2.3 या 2.4 kW दिख रहा है। पहला ख्याल यही आता है कि कहीं ठग तो नहीं लिया गया। ज्यादातर मामलों में ऐसा नहीं होता। पैनल खराब नहीं होता, बस हमें ये नहीं बताया गया होता कि छत पर बिजली बनने की हकीकत लैब वाली कहानी से अलग है। चलिए एक-एक वजह देखते हैं।

पहले एक कड़वी बात: 100% कभी नहीं मिलता

पैनल पर जो वाट लिखा होता है, वो लैब की खास शर्तों में नापा गया आंकड़ा है। वहां तापमान 25 डिग्री रखा जाता है और रोशनी एक तय मात्रा में दी जाती है। आपकी छत पर न 25 डिग्री मिलता है, न हर वक्त वैसी रोशनी। इसलिए आमतौर पर दोपहर में भी पैनल अपनी लिखी क्षमता का करीब 75 से 85 प्रतिशत ही देते हैं। अगर आपका सिस्टम इसके आसपास है, तो वो ठीक चल रहा है। चिंता तब करनी चाहिए जब आंकड़ा इससे काफी नीचे गिरे।

गर्मी: वो दुश्मन जो दिखता नहीं

अजीब लगेगा, लेकिन सोलर पैनल को रोशनी पसंद है, गर्मी नहीं। जैसे-जैसे पैनल गर्म होता है, उसकी बिजली बनाने की क्षमता घटती जाती है। ज्यादातर पैनलों के डेटाशीट में लिखा होता है कि 25 डिग्री से ऊपर हर एक डिग्री पर लगभग 0.3 से 0.45 प्रतिशत उत्पादन कम हो जाता है। मई-जून की धूप में छत पर पैनल का तापमान 60 से 70 डिग्री तक पहुंच जाता है। हिसाब लगाइए तो 10 से 15 प्रतिशत की कमी सिर्फ गर्मी से ही हो सकती है। इसीलिए सर्दियों की साफ और ठंडी धूप में आपका सिस्टम कई बार गर्मी से बेहतर प्रदर्शन करता है, जबकि गर्मी में धूप ज्यादा तेज होती है।

धूल, चिड़िया की बीट और जमी हुई परत

ये सबसे आसान वजह है, और लोग इसे अक्सर ही नजर अंदाज कर देते हैं। पैनल की ऊपर वाली धूल की पतली परत भी रोशनी को रोक देती है, बस फर्क कई बार साफ दिखता नहीं। जिन इलाकों में धूल ज्यादा उड़ती है, जैसे राजस्थान, गुजरात या जहां निर्माण बहुत होता है, वहां कुछ हफ्तों में ही नुकसान 5 से 20 प्रतिशत तक जा सकता है। ये आंकड़ा हर जगह अलग रहता है, मौसम पर भी बहुत फर्क पड़ता है। और हां, चिड़िया की बीट तो इसके भी ऊपर वाली परेशानी है, क्योंकि वो एक जगह जम कर पैनल के एक हिस्से को पूरा ढक सकती है। बारिश धूल को थोड़ा धो देती है, लेकिन जमी हुई परत अक्सर हटती नहीं, और फिर वही असर रहता है।

छाया: एक छोटी सी चीज भी भारी पड़ती है

यहां सोलर की सबसे अजीब बात (या कहिए उलझन) आती है। पैनल आम तौर पर एक कतार में जुड़े होते हैं, यानी सीरीज में। इसका मतलब ये कि अगर एक पैनल के किसी हिस्से पर पानी की टंकी की छाया पड़ गई, तो पूरी कतार की बिजली गिर सकती है। पानी की टंकी, एंटीना, मुंडेर, पास का पेड़, या सूखते कपड़े भी छाया बना सकते हैं। सुबह और शाम को छाया लंबी हो जाती है, इसलिए उस समय ज्यादा नुकसान नजर आता है। आप अपनी छत पर सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे के बीच एक बार देखिए कि किसी पैनल पर छाया तो नहीं पड़ रही।

दिशा और झुकाव

भारत में पैनल को दक्षिण की तरफ मुंह कर के लगाना आम तौर पर सबसे अच्छा माना जाता है, और उनका झुकाव भी आपके शहर के अक्षांश के आसपास रखा जाता है, यानी ज्यादातर जगह 20 से 30 डिग्री के बीच। अगर छत की बनावट की वजह से पैनल पूर्व-पश्चिम की तरफ लग रहे हों, या फिर झुकाव बहुत कम हो जाए, तो कुल उत्पादन थोड़ा घट सकता है। कई बार ये समझौता मजबूरी में करना पड़ता है, और ठीक भी है, बस उम्मीदें उसी हिसाब से रखें।

तार, कनेक्शन और इन्वर्टर

पैनल से निकली बिजली, इन्वर्टर तक आते-आते तारों में थोड़ी गर्मी बन कर खो जाती है। पतले तार, या ढीले कनेक्टर इस नुकसान को और बढ़ा देते हैं। इन्वर्टर भी बिजली बदलते वक्त करीब 2 से 3 प्रतिशत हिस्सा अपने लिए रख लेता है। एक और बात, अगर इन्वर्टर की क्षमता पैनल के मुकाबले बहुत कम चुनी गई है, तो तेज धूप में वो ऊपर की बिजली काट देता है। इसे क्लिपिंग कहते हैं, और ये कभी-कभी डिजाइन के तहत ठीक से, लेकिन कभी-कभी लापरवाही से भी हो जाता है।

उम्र: हर साल थोड़ा घटना

पैनल समय के साथ वही जैसा नहीं रहता। पहले साल में 1 से 2 प्रतिशत तक गिरावट होना सामान्य माना जाता है, और उसके बाद हर साल औसतन आधा से पौना प्रतिशत। इसी वजह से कंपनियां 25 साल की परफॉर्मेंस वारंटी देती हैं, जिसमें आखिर में भी करीब 80 प्रतिशत से ऊपर उत्पादन का वादा किया जाता है। अपने पैनल की असली शर्तें डेटाशीट और वारंटी पेपर में जरूर पढ़िए, क्योंकि हर कंपनी की संख्या अलग हो सकती है।

सस्ता पैनल और जल्दबाजी का इंस्टॉलेशन

बाजार में ऐसे पैनल भी दिखते हैं जिनकी असली क्षमता लिखी हुई क्षमता से कम निकलती है, या जो गर्मी में काफी ज्यादा गिरते हैं। और इंस्टॉलेशन में कमी, जैसे पतले तार, कमजोर जोड़, या गलत दिशा, अच्छे पैनल के साथ भी नुकसान करा सकती है। अगर आपने सबसे सस्ता कोटेशन ही देखा था, तो दिक्कत वहीं छुपी हो सकती है।

घर बैठे कैसे पता करें कि कमी कहां है

सबसे आसान उपाय ये है कि रोज एक ही समय पर, जैसे दोपहर 12 बजे, इन्वर्टर या ऐप का आंकड़ा नोट करें। कम से कम दो हफ्ते का रिकॉर्ड आपको ये साफ बता देगा कि गिरावट धीरे-धीरे हो रही है या अचानक। फिर एक सुबह जल्दी, पैनल को थोड़ा सावधानी से धो दीजिए, और अगले दिन का आंकड़ा देखिए। अगर उत्पादन बढ़ता है तो धूल वाला कारण मजबूत लगने लगता है। अगर किसी एक पैनल या कतार की आउटपुट बाकियों से बहुत कम है, तो छाया या ढीला कनेक्शन जैसी चीजें जांचिए। इन्वर्टर पर कोई एरर दिखे, या बीप बजती रहे तो इंस्टॉलर को फोन कीजिए और वारंटी वाली बात याद दिलाइए। और सबसे जरूरी, छत पर चढ़ते वक्त सुरक्षा को पहले रखें, बिजली के कनेक्शन खुद मत छुइए।

solar panel efficiency kam kyun hoti hai आखिर में

सोलर पैनल की कमी हमेशा खराबी का पक्का सबूत नहीं होती। ज्यादातर कमी गर्मी, धूल, और छाया जैसी वजहों से आती है कुछ पर आपका कंट्रोल होता है, कुछ पर नहीं। सिस्टम को समझिए, उसका रिकॉर्ड रखें, और जब सच में आंकड़ा गड़बड़ लगे तभी इंस्टॉलर से बात करिए, सवाल करिए। वैसे इस लेख में जो संख्याएं दी गई हैं वो सामान्य अनुमान हैं, आपके पैनल की डेटाशीट उन्हें बदल सकती है।

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